Saturday, August 14, 2010

मगही महाकाव्य गौतम और मगही रामायण का लोकार्पण


मगही दिवस के रूप मे मनेगी योगेश की जयंती

बाढ़ । मगही कवि स्व। योगेश्वर सिंह योगेश की पुण्यतिथि समारोह के मौके पर बीती रात नीरपुर गांव मे अखिल भारतीय मगही-कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन की अध्यक्षता साहित्यकार मगही अकादमी के अध्यक्ष उदय शंकर ने की जबकि संचालन मगही के चर्चित कवि रामाश्रय झा ने किया। सम्मेलन मे बिहार व यूपी की विभिन्न जगहो से आये साहित्य- काव्य के कई दिग्गज पुरोधा शामिल हुए। कवियो की व्यंगात्मक व समाजिक कुरितियो पर प्रहार करती काव्य रस की सुर सरिता मे श्रोतागण देर रात तक झूमते रहे। हिसुआ से आये चर्चित कवि दीनबंधु, कवि कारू गोप, जयराम जी, व गोपालगंज के पंकज जी समेत अन्य साहित्यकारो ने सामाजिक अव्यवस्था पर चोट करती कविता पाठकर लोगो को मंत्र मुग्ध कर दिया। इस मौके पर कवि योगेश फाउंडेशन के द्वारा मगही मंडल के अध्यक्ष व वरिष्ठ साहित्यकार डा। रामनंदन जी को 2010 का योगेश शिखर सम्मान प्रदान किया गया। एक साथ जुटे मगही साहित्य के दिग्गजो ने इस मौके पर घोषणा किया कि कवि स्व। योगेश की जयंती 23 अक्टूबर को मगही दिवस के रूप मे मनाया जायेगा। समापन समारोह को संबोधित करते हुए मृत्युंजय कुमार ने कहा कि कवि योगेश जी और अन्य कवियों की 1950 के दशक की दुर्लभ पांडुलिपियां मगही मंडल व बिहार सरकार को सौप देंगे ताकि मगही साहित्य का प्रचार प्रसार व्यापक रूप से हो सके।

Saturday, August 7, 2010

मगही के प्रथम महाकाव्य गौतम और मगही रामायण का लोकार्पण १२ अगस्त को


मगही के प्रथम महाकाव्य गौतम और मगही रामायण का लोकार्पण १२ अगस्त को महाकवि योगेश के गाँव पटना के नीरपुर में उनकी पहली पुण्यतिथि के अवसर पर होगा। बिहार के वरिष्ठ मंत्री नंदकिशोर यादव, नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी के वीसी जीतेन्द्र कुमार सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार रामदेव शुक्ल, डॉ अनिल राय, प्रो प्रमोद कुमार सिंह आदि इस अवसर पर मौजूद रहेंगे। लोकार्पण के बाद अखिल भारतीय मगही भासा सम्मलेन का अधिवेशन और कवि सम्मलेन होगा। कार्यक्रम का आयोजन महाकवि योगेश फौन्डेशनकि ओरसे किया जा रहा है।

Monday, September 7, 2009

आंसू दे गया मगही के अंतिम सूर्य का अस्त होना



- प्रोफेसर साधु शरण सिंह सुमन(बिहार के वरिष्ठ साहित्यकार एवं भोजपुरी कवि, अणुव्रत आंदोलन से भी जुड़े। मोबाइल नंबर ०९३३४१३३७०८ पर संपर्क किया जा सकता है।)
दरअसल जन-जन के लोकप्रिय लोक कवि डा.योगेश्वर प्रसाद सिंह योगेश ने हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत का विद्वान होने के बावजूद लोकभाषा मगही को साहित्य सेवा का जरिया बनाया। यही अपने आप में लोक के प्रति उनकी सेवा भावना को दर्शाता है। कवि, साहित्यकार और मानस विशेषज्ञ योगेश जी ने शिक्षा अधिकारी के पद से सेवा निवृत्ति के बाद खुद को लोक साहित्य और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया। दो दर्जन से अधिक पुस्तकों की रचना और कई पत्रिकाओं का संपादन कर उन्होंने साबित किया कि वह अप्रतिम प्रतिभा के धनी थे। मगही में जहां उन्होंने महाकाव्य गौतम की रचना की, वहीं मगही रामायण और गीता भी लिख डाली। योगेश लोकभाषा मगही के आखिरी सूर्य थे। इससे पहले मगही के तीन सूर्य लखीसराय के डा. श्रीनंदन शा ी, बड़हिया के मथुरा प्रसाद नवीन और नालंदा के जयराम सिंह जयराम गुजर चुके थे। ऐसे में योगेश जी के रूप में आखिरी सूर्य के अस्त होने की सूचना आंसू दे गया।बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के आजीवन सदस्य और पटना जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष योगेश जी मगही भाषा को बिहार लोक सेवा आयोग की प्रतियोगिता परीक्षाओंं में शामिल कराने के लिए आजीवन प्रयासरत रहे। इस उद्देश्य से उन्होंने कई प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व किया और राज्य सरकार से लगातार इसकी मांग करते रहे। योगेश जी ने मगही के उत्थान के लिए संपूर्ण मगध क्षेत्र में आधे दर्जन से अधिक संस्थाओं की स्थापना की। उन्होंने बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर नि:स्वार्थ और स्वांत: सुखाय भाव से मगही का प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने अपने आखिरी समय तक युवा कवियों का मार्गदर्शन किया। योगेश जी के निधन पर बाढ़ के साहित्यप्रेमियों की ओर से शोक सभा का आयोजन हुआ। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अत्यंत आनन-फानन में आयोजित इस शोकसभा में सैकड़ों लोग उमड़ पड़े। सभा में फैसला लिया गया कि डा.योगेश जी के नाम पर हर वर्ष एक लोक साहित्यकार को योगेश स्मृति सम्मान प्रदान किया जाएगा। इसके अलावा मगही के युवा रचनाकार योगेश जी के जाने से खुद को अकेला न समझें, इसी सोच के साथ डा.योगेश स्मृति संस्थान स्थापित करने का फैसला लिया गया। इस संस्था की ओर से नवोदित लोक कवियों, रचनाकारों की मदद की जाएगी।न केवल साहित्यकारों, बल्कि समाज के निचले तबके के लोगों की मदद के लिए भी योगेश जी हमेशा तैयार रहते थे। बाढ़ में ही एक बार साक्षरता अभियान के एक कार्यक्रम में मैं और योगेश जी साथ पहुंचे थे। वहां बच्चों को बड़ी संख्या में कलम और पेंसिलें बांटी जा रही थीं। योगेश जी ने मुझसे कहा कि मैं उन्हें एक सौ कलमें दिलवा दूं। मुझे उनकी इस मांग पर बड़ा आश्चर्य हुआ, फिर भी मैंने आयोजकों से कह कर योगेश जी को सौ कलमें दिलवा दी। अगले ही दिन मुझे यह जानकर और भी ज्यादा आश्चर्य हुआ कि योगेश जी सुबह सवेरे उठकर पास की दलित बस्ती में गए और बच्चों को कलमें बांट कर पढऩे के लिए प्रेरित किया।मानस मर्मग्य योगेश जी रामचरित मानस के एक अच्छे प्रवचनकर्ता भी थे। इसके लिए मध्य प्रदेश में उन्हें मानस हंस का सम्मान दिया गया था। उनके मन में सभी धर्मों के लिए आदर का भाव था। करीब चार साल पहले का एक वाकया याद आता है। मैं योगेश जी के साथ राजस्थान के पाली जिले में सांप्रदायिक सद्भाव के लिए आयोजित एक साहित्यिक सम्मेलन में पहुंचा था। हिंदी और उर्दू के कवि अपनी डफली आपना राग अलाप रहे थे। बारी जब डा.योगेश की आई तो उन्होंने अत्यंत सरल भाषा में समझाया कि जो 'ऊंÓ है, वही इश्वर है, वही अल्लाह है। सभी का मूल भाव एक है। उनकी लोकप्रिय शैली से गदगद हुए वहां मौजूद प्रबुद्ध श्रोता पूछने लगे, यह कहां के कवि हैं? पता चला बिहार तो कइयों की टिप्पणी थी, ऐसी विभूति बिहार ही पैदा कर सकता है।सादगी के प्रतिमूर्ति योगेश जी बड़ी-बड़ी और कड़ी-कड़ी मूंछें रखते थे। उनकी 'मूंछ महातमÓ कविता इतनी लोकप्रिय है कि जो एक बार सुन लेता था उसके मानस में योगेश जी मूंछ वाले कवि के रूप में बस जाते थे। वह कई बार मेरे घर आ चुके थे। एक दिन उन्होंने मेरी पत्नी से कहा, सुमन जी से भी कहो कि मूंछ रखे। इसके साथ ही उन्होंने वह कविता मेरी पत्नी को भी सुना दी-तू बात मूंछ के नय पूछ, एकरा में बड़ा बखेरा हे।जे हमरा दन्ने ताक हे, समझे बड़ा लखेरा हे॥मूंछ मरद के चिन्हा हे, दुस्मन खातिर छरबिन्हा हे।मूंछ रहल त भारत जीतल, मूंछ कटल तब हारऽ ह।कि हम्मर मूंछ निहारऽ हअ।
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मगध की मिट्टी में जन्मे मानस मर्मग्य डा.योगेश्वर प्रसाद सिंह योगेश ने मगध को महिमा मंडित किया। मगही भाषा को अग्रणी लोकभाषा बनाने के लिए योगेश जी द्वारा चलाए गए अभियान को मगध क्षेत्र कभी भुला नहीं सकता। ७८ साल की आयु में भी वे साहित्य सेवा के लिए मूंछ पर ताव देकर खड़े रहते थे। गंगा की पावन धरती पर जन्मे योगेश जी में जहां सादगी कूट-कूट कर भरी हुई थी, वहीं साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाओं को सहयोग देने के लिए वह दिन-रात उपलब्ध रहते थे। क्षेत्र के दर्जनों युवा कवियों और रचनाकारों के योगेश जी प्रेरणा ोत हैं और बने रहेंगे। समाजसेवी योगेश जी साक्षरता अभियान, नशा मुक्ति अभियान जैसे कार्यक्रमों से भी जुड़े रहे। खुद नशा से दूर रहने वाले योगेश जी ने दर्जनों सम्मान प्राप्त करने के बावजूद किसान की वेषभूषा नहीं त्यागी। इंजोर में एक कवि ने उनका काव्य चित्र खींचा था-सांवर रंग झोलंगा कुरता, सिर पर छोटगर टीक। फरसा अइसन मोछ टेंढ़ हे, बोले मेंं निर्भीक॥ उनका यही रूप उन्हें सर्वश्रेष्ठï जनकवि बनाता है।- पंडित सत्यनारायण चतुर्वेदी।

Wednesday, April 9, 2008

की हम्मर मोछ निहार ह?

यह कविता मगही की सबसे लोकप्रिय कविताआें में से एक है। १९६७ से अभी तक एक हजार से अधिक मंचों पर यह कविता पढ़ी जा चुकी है पर इसकी मांग आज भी उतनी ही है। आम लोगों में आशुकवि डा. योगेश्वर प्रसाद सिंह योगेश की पहचान मगही के प्रथम महाकाव्य ..गौतम.. की रचना के लिए उतनी नहीं है जितनी इस कविता के लिए है।

की हम्मर मोछ निहार ह?
मोछ पर सान हल भारत के
हल मोछ सहारा आरत के
जहिना से मोछ कटा गेलो
ई लच्छन भेलो गारत के
जब मोछ हलो तब जय भेलो
अब मोछ कटल तब हार ह।।की हम्मर..

ई मोछ मरद केचिन्हा हे
दुस्मन खातिर छरबिन्हा हे
मोछे कटवा के राजपूत
अब सिंह से बनलन सिन्हा हे
जब मोछे नय तब झूठ मूठ
की उलटे सान बघार ह।। की हम्मर..

पमही से रेख उठानी हे
मोछे से सरस जुआनी हे
बिनु मोछ निपनिया कहलइब
मोछेसे मुंह के पानी हे
तूं मोछ कटा मेहरी बनल
अब बैठल मच्छी मार ह।। की हम्मर...

हल मोछ भीम अउ अरजुन के
कांपल दुस्मन बोली सुन के
पृथ्वीराज के मोछ देख
भागल गोरी अंखिया मुन के
हे सगरो झगड़ा मोछे के
तूं बिना मोछ ललकार ह।। की हम्मर..

ऊ वीर शिवाजी, राना के
ऊ वीर कुंवर मरदाना के
मोछे से दुस्मन मात भेल
तात्या टोपे अउ नाना के
तूं मोछ कटा फिल्मी दुनियां
में जाके दांत चियाड़ ह।। की हम्मर..

हल वीर भगत के मोछे पर
आजादी के मतवालापन
वीरे रस के कविता कइलन
मोछेवाला ऊ कवि भूषण
तूं मोछ कटा के मउगी भिर
चुपके से लत्ती झार ह।। की हम्मर...

मोछे तो भेद बताव हे
ई मरद अउर मेहरारू के
बाहर के धूरी गरदा ल
ई काम कर% हे झारू के
फरसाकट की फ्रेंचकट के भी
तू नय भार सम्हार ह।। की हम्मर...

(रचना काल : २५ दिसंबर १९६७)

Wednesday, April 2, 2008

मगही बोलनेवालों के लिए कुछ खास

मगही के महाकवि योगेश जी के लोक्प्रिये कविता ...की हम्मर मोछ निहार ह?... कल येही ब्लॉग पर देखल जा सक हे। इ कविता मगही भासा के सबसे लोकप्रिय मंचीय कविता मानल जा हे। एकरा ला इंतजार कर कल तक।

Tuesday, March 4, 2008

मगही भाषा हे या बोली?

मगही भाषा हे या बोली? एकरा बहस कइल जा सक हे। लेकिन अगर मैथिली और भोजपुरी भाषा के सम्मान पा सक हे तो फिर मगही से भेदभाव काहे? पटना, गया, जहानाबाद, मसौढ़ी, फतुहा, नालंदा, नवादा, मुंगेर, बेगुसराय, हजारीबाग, गिरीडीह, औरंगाबाद, डालटेनगंज, गढ़वा, बोकारो, सिंहभूमि, झरिया आदि कम से कम १७ जिला में मगही भाषा के प्रसार हे। ई संख्या अधिक भी हो सक हे। ओइसे एतना भी कम न हे। लेकिन मगही केकवि साहित्कार सबकेअभियान राजनीतिक समर्थन न मिले के कारण परिणाम देवेवाला आंदोलन न बन सकल। यूनिवर्सिटी में कोर्स लगला के बाद भी पढाई के व्यवस्था न हे। मगही अकादमी मरनासन्न हे। साहित्त अकादमी में मैथिली के पुरस्कार हे पर मगही पर कोई धेयान न देल गेल। तुलनात्मक तौर पर मगही के इतिहास मैथिली और भोजपुरी दोनों से पुराना हे। जैन धरम के तीर्थंकर महावीर भी अपन उपदेश अर्ध मागधी में देलन हल। गौतम के उपदेश भी मगध के जनभाषा मागधी में हल जेकरा बाद में पाली में लिपिबद्ध कइल गेल। एकर वर्तमान स्वरूप केझलक सिद्ध सरहपाद के रचना से देखल जा सक हे। अब जबकि बिहार के मुखमंत्री भी मगही भाषी हथन तब भी ओही स्थिति हे।